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आर्य समाज मंदिर राज नगर में श्राद्ध का वैदिक स्वरूप पर संगोष्ठी ऑनलाइन सम्पन्न
September 7, 2020 • विकास दीप त्यागी • उत्तर प्रदेश
  • जीवितों को ही श्राद्ध तर्पण रूप हमारी सेवायें प्राप्त हो सकतीं हैं मृतकों को नहीं: प्रो विनय विद्यालंकार

युरेशिया संवाददाता

गाजियाबाद, आर्यसमाज राजनगर के तत्त्वावधान में  श्राद्ध का वैदिक स्वरूप पर संगोष्ठी का आयोजन अन्तरजालीय जूम एप के माध्यम से किया गया।

संगोष्ठी में वैदिक विद्वान् मुख्य वक्ता विनय विद्यालंकार हल्द्वानी ने कहा कि श्राद्ध किसे कहते हैं?इस जिज्ञासा पर शास्त्र के अनुसार-श्रत्सत्यं दधाति यया क्रियया सा श्रद्धा श्रद्धया यत्कर्म क्रियते तच्छ्राद्धम् सत्य को श्रत् कहते हैं,उस श्रत् को जिस क्रिया से ग्रहण किया जाता है उस सत्य क्रिया का नाम श्रद्धा है।इस श्रद्धा की भावना से जो कर्म किया जाता है उस पवित्र कर्म का नाम श्राद्ध है।यह श्राद्ध कर्म विभिन्न क्षेत्रों में किया जाता है।जब यह श्राद्ध पूजनीयगण पितर के प्रति करते हैं तब उसमें  जन्मदाता माता पिता आदि ही हमारे श्रद्धेय नहीं होते अपितु अपनी-अपनी विशेषताओं से अन्य जीवित महापुरुषों को भी शास्त्रों में सोमसद,अग्निष्वात्त,बर्हिषद, सोमपा,हविर्भुज,आज्यपा, सुकालिन्,न्यायकारी,पिता, पितामह,माता,प्रपितामही आदि नामों से पुकारा गया है।उन्होंने आगे कहा कि हम मनुष्यों के पांच नित्य कर्त्तव्य कर्मों में से एक कर्म पितृयज्ञ भी है।इस पितृयज्ञ के दो भाग होते हैं एक श्राद्ध व दूसरा तर्पण।जिस-जिस कर्म से तृप्त करते हैं उस-उस  कर्म को तर्पण कहते हैं;अतः तृप्यन्ति तर्पयन्ति येन पितृन् तत्तर्पणम् जिस-जिस कर्म से माता पितादि पितर प्रसन्न हों उनको करना तर्पण है।ये श्राद्ध व तर्पण कर्म  के जीवितों के लिये विहित हैं मृतकों के लिये नहीं।श्रद्धा से जीवित माता पितादि का उत्तम अन्न,वस्त्र,सुन्दर यान आदि पदार्थों को देकर जिस-जिस कर्म से उनका आत्मा तृप्त और शरीर स्वस्थ रहे उस-उस कर्म से प्रीति पूर्वक सेवा करनी श्राद्ध और तर्पण कहलाता है।इसके विपरीत जो पोप जी के बहकाने में आकर वर्ष के एक आश्विन मास में मृतक पूर्वजों के श्राद्ध के नाम पर पोप जी व कौओं आदि को भोजन खिलाया जाता है व दान किया जाता है वह सर्वथा अनुचित व अशास्त्रीय है।देखो -पितर नाम मृतकों का नहीं होता अपितु जीवितों का है।जैसे प्रज्ज्वलित अग्नि में ही आहुति लगती है बुझने पर नहीं उसी प्रकार जीवितों को ही श्राद्ध तर्पण रूप हमारी सेवायें प्राप्त हो सकतीं हैं मृतकों को नहीं।तनिक बुद्धि का उपयोग कर विचार करें कि तथाकथित श्राद्धों में किसी अन्य मनुष्य को खिलाया हुआ मृतकों को कैसे पहुँच सकता है ? श्राद्ध करने वाले मनुष्य के पूर्वज पितर ने अब किस योनि में जन्म पाया है इसके जाने विना उन्हें वहां भोजन कैसे पहुंचाया जा सकता है?यदि इस प्रकार ही भोजन पहुंचने लगे तो यात्रा पर जाते समय यात्री के लिये भोजन की व्यवस्था ही क्यों की जाये,तब तो पोप जी को खिलाने से ही यात्री का पेट भर जाया करे।अतः सत्य सनातन वैदिक धर्म के प्रचार प्रसार के लिये अन्धविश्वासों से बचो और सत्य को धारण करो। 

      आर्य भजनोपदेशक पण्डित दिनेश दत्त दिल्ली ने मधुर व सशक्त ध्वनि में श्राद्ध का वैदिक स्वरूप पर गाए गीतों द्वारा ऑनलाइन श्रोताओं मन मोह लिया।

      आर्यसमाज राजनगर के संरक्षक व स्वागताध्यक्ष श्री श्रद्धानन्द शर्मा ने कहा कि यदि कोई यह कहे कि अजी!इसी बहाने काक आदि पक्षियों व ब्राह्मणों को भोजन करा दिया जाता है तो उन बन्धुओं को समझाओ कि इन गलत बहानों से सच्चा ब्राह्मण तुम्हारा भोजन कभी ग्रहण नहीं कर सकता क्योंकि अविद्या का नाश व विद्या की वृद्धि करना उसका कर्त्तव्य होता है। इस कर्त्तव्य से बन्धा हुआ वह ब्राह्मण धर्म विरुद्ध परम्पराओं को बढ़ाने में कभी सहयोगी नहीं बनता। इसलिये यदि भोजन कराना है तो अवश्य कराइये और वर्ष के एक महीने के कुछ ही दिनों के भीतर नहीं अपितु प्रतिदिन कराइये।किन्तु यह भोजन अन्धविश्वास से पृथक् होकर वैदिक नित्य कर्त्तव्य के बहाने से बलिवैश्वदेव यज्ञ व अतिथि यज्ञ के रूप में होना चाहिये।भोजन बनाकर खाने से पहले परमात्मा की प्रजा पशु पक्षी आदि प्राणियों को खिलाना बलिवैश्वदेव यज्ञ है और धार्मिक व विद्वान् महापुरुषों को खिलाना व उनसे सदुपदेश ग्रहण करना  अतिथि यज्ञ है; इन्हें करने से महान् पुण्य परमात्मा का प्रसाद प्राप्त होता है यह सुनिश्चित जानो और अन्यथा करने से अन्ध विश्वास बढ़कर अन्धपरम्परायें चलने से बहुत बड़ी हानि होती है। अतः पोप जी के ऐसे पाखण्डों से बच कर प्रतिदिन जीवित पितरों की सेवा करते हुए ऋषियों के द्वारा निर्दिष्ट पितृयज्ञ करना चाहिये।यही वैदिक धर्म का वास्तविक श्राद्ध है।

  संगोष्ठी समारोह का सञ्चालन आर्यसमाज के यशस्वी मन्त्री सत्यवीर चौधरी ने किया अपने सम्बोधन में उन्होंने कहा कि सत्य सनातन वैदिक धर्म में पांच महायज्ञ होते हैं जो नित्य करने होते हैं उनमें एक पितृ यज्ञ भी है। प्रत्येक गृहस्थ को प्रतिदिन पितृ यज्ञ अर्थात अपने माता,पिता व परिवार के सभी वरिष्ठ सदस्यों का सम्मान,सेवा,सुश्रुषा करते रहना चाहिए।

समारोह अध्यक्ष श्री ओम प्रकाश ने कहा कि आर्यसमाज शुद्ध वैदिक धर्म का प्रचार करता है। वैदिक धर्म से ही मनुष्य का सर्वांगीण विकास होता है और इसी से देशभक्त,ईश्वर भक्त और चरित्रवान नागरिक बनते हैं।

आर्य समाज राजनगर के प्रधान सुभाष चन्द्र गुप्ता ने ऑनलाइन उपस्थित श्रोताओं को देख प्रसन्नता जाहिर की ओर  उनको धन्यवाद दिया ओर शांति पाठ के साथ कार्यक्रम सम्पन्न कराया।

इस अवसर पर मुख्य रूप से राजेश सेठी, प्रवीण आर्य,देवेन्द्र गुप्ता आदि उपस्थित रहे।