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गांव-गांव पैदल उतरीं कोरोना युद्ध में वारियर्स आशा
May 31, 2020 • Vikas Deep Tyagi • मेरठ

  •  संक्रमित और अप्रवासी की जानकारी जुटा रहीं, टीकाकरण से लेकर पोषण वितरण में निभा रही अहम भूमिक

यूरेशिया संवाददाता

मेरठ । कोरोना के विरुद्ध लडाई में आशा कार्यकर्ता पैदल ही एक ऐसा युद्ध लड़ रही हैं जो हजारों लोगों को सुरक्षित रख रहा है। वह स्वास्थ्य व्यवस्था का जमीनी स्तर पर पहला सुरक्षा घेरा हैं, जो बिना पुलिस की सहायता लिये हुए ग्रामीण स्तर पर कोरोना के विरूद्घ लडाई लड़ते हुए भीषण गर्मी होने के बाद भी बच्चों, महिलाओं व अप्रवासी व अन्य लोगों को जागरूक करने में अहम भूमिका निभा रही हैं। देश हित के लिये वह इससे आगे भी जाकर कुछ करने के लिये तैयार है।
 मेरठ जिले की बात करें तो यहां पर ग्रामीण स्तर पर 1650 शहरी क्षेत्र में 416 आशा कार्यकर्ता हैं। आशा कार्यकर्ताओं के ऊपर जिले में 85 आशा संगिनी हैं। आशा कार्यकर्ताओं का मुख्य कार्य पोषण वितरण, टीकाकरण, पोलियो ड्राप्स पिलाना, टीबी के मरीजों को खोजकर उनको बीमारियों के प्रति जागरूक करना है, लेकिन कोविड-19 संक्रमण काल में इनकी जिम्मेदारी अधिक महत्वपूर्ण हो गयी है। बाहर से आये अप्रवासी,  कोरोना से संक्रमित  मरीज व उनके परिजनों को कोरोना के प्रति जागरूक करना  इनकी मुख्य जिम्मेदारी बन गयी है। इस कार्य को करने के लिये घऱ-घर पैदल ही आना-जाना पड़ता है। इस बारे में देहात की कुछ आशा व आशा संगिनियों की द्वारा चलाये जा रहे जागरूकता अभियान की सच्चाई को जानने का प्रयास किया गया।
खुफिया विभाग की तरह कार्य किया

 रजपुर ब्लॉक की भावनपुर की आशा संगिनी आशा शर्मा ने बताया कोरोना के संक्रमण को रोकने लिये वह ग्रामीण क्षेत्र के लोगों को जागरूक कर रही हैं। शुरुआत में उन्हें काफी परेशानी का सामना करना पड़ा, पहले लोग बाहर से आये लोगों के बारे में जानकारी देने से कतरा रहे थे। इसके लिये उन्होने आशा कार्यकर्ताओं के माध्यम से ग्राम प्रधान व गांव के गण्यमान्य लोगों को साथ लेकर कोरोना वायरस के बारे में लोगों को मोटिवेट करते हुए बताया कि यह कितनी भंयकर बीमारी है। इससे बचने का एक ही तरीका है कि गांव में कोई संक्रमित है तो उसके बारे में बताने में ही भलाई है। धीरे -धीरे लोगों की समझ में आने लगा। एक समुदाय के लोगों ने शुरू में इसका विरोध किया, लेकिन उनको जागरूक करने के बाद लोग बाहर से आये लोगों के बारे में स्वंय जानकारी दे रहे हैं। उन्होंने बताया इस कार्य के लिये खुफिया विभाग की तरह कार्य किया। गांव के कुछ लोगों को साथ लिया। कई बार आशा कार्यकर्ताओं को सर्वे के दौरान भी काफी परेशानी का सामना करना पड़ा, लेकिन ग्राम प्रधान द्वारा लोगों को समझाने पर लोगों का विरोध कम हो गया है।
 लोगों की सेवा करने में मिलती है खुशी

सरधना ब्लॉक देहात के इस्लामाबाद की आशा कार्यकर्ता कौशर जहां ने बताया कोरोना के विरूद्घ लड़ाई में लोगों को जागरूक करने में शुरूआत में काफी परेशानी का सामना करना पडा। क्षेत्र के लोग कुछ भी बताने से इनकार कर देते थे। बाद में ग्राम प्रधान को साथ लेकर कोरोना संक्रमण के बारे में लोगों को मोबाइल व रेडियों के माध्यम से जागरूक किया गया। लोगों को मोटिवेट किया गया।  अब जाकर कोरोना जैसी बीमारी के प्रति लोग सचेत हो गये हैं। सोशल डिस्टिसिंग का पालन करते हुए चेहरे पर मास्क पहन कर समझदार लोग लॉक डाउन का पालन करा रहे हैं। लॉक डाउन में काफी परिवारों के सदस्य पंजाब व हिमाचल प्रदेश से आये। उनको क्वारेंटाइन करते हुए कोरोना के प्रति जागरूक किया। कौशर जहां का कहना है कि उन्होनें पूरा जीवन देश की सेवा के लिये समर्पित कर दिया है। लोगों की सेवा करने मे उन्हें काफी खुशी मिलती है।  
 शुरुआत में आयीं मुश्किलें 

मई महीने की चिलचिलाती धूप में पांच मिनट खड़ा होना भी भारी पड़ता है। ऐसे में माछरा ब्लॉक की आशा संगिनी सुमन अन्य आशा कार्यकर्ताओं के साथ गांव उल्देपुर में  सर्वे करती मिलीं। सभी के चेहरे पसीने से लथपत थे, लेकिन इसकी परवाह किसी को नहीं थी। वह अपने कार्य में व्यस्त थीं,  कुछ आशा गांव में स्लोगन लिखती दिखाई दीं, जिनके शब्द कुछ इस प्रकार थे, “आशा ने मिलकर ठाना है सब घर में रहे देश से कोरोना को भागना है”, “नून रोटी खाएंगे घर से बाहर नहीं जाएंगे।“ कहीं लिखा था “पापा घर पर रहो बाहर कोरेाना है, सब साथ रहे किसी को नहीं है खोना “। हरियाणा से पढ़ाई करने वाली सुमन ने बताया उनके पिता प्रोफेसर थे। उन्हें समाज सेवा का जुनून था । पापा को देखकर मेरे अंदर भी समाज सेवा की भावना जाग्रत होने लगी। शाहपुलीपुर में शादी होने के बाद सुसराल से मिले सहयोग से समाज सेवा करने के लिये उन्होंने आशा का जीवन चुना। उन्होंने बताया 2006 से वह समाज सेवा करती आ रही हैं। कोरोना से जंग जीतने के लिये उन्होंने आठ गांवों की आशा कार्यकर्ताओं के साथ लोगों को कोरोना के प्रति जागरूक करने के लिये अभियान चलाया हुआ है। इस दौरान उन्हे शुरुआत में काफी परेशानी का सामना करना पड़ा, लेकिन जब लोगों को मोटिवेट किया गया तो उनमें कोरोना के प्रति जागरूकता बढ़ी। उनके क्षेत्र में आने वाले गांवों में लोग सोशल डिस्टेंसिंग का पालन कर रहे हैं। मास्क भी इस्तेमाल कर रहे हैं। उन्होंने बताया समाज सेवा के साथ वह सांप के काटे हुए लोगों का नि:शुल्क उपचार भी करती हैं। अब तक वह 200 मरीजों का नि:शुल्क उपचार कर चुकी हैं।