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जहां मित्रता हो वहां संदेह कैसा
December 8, 2019 • Vikas Deep Tyagi • विविध

श्रीकृष्ण और सुदामा का प्रेम बहुत गहरा था। प्रेम भी इतना कि श्रीकृष्ण, सुदामा को रात-दिन अपने साथ ही रखते थे। कोई भी काम होता, दोनों साथ-साथ ही करते। एक दिन दोनों वनसंचार के लिए गए और रास्ता भटक गए। भूखे-प्यासे एक पेड़ के नीचे पहुंचे। पेड़ पर एक ही फल लगा था। श्रीकृष्ण ने घोड़े पर चढ़कर फल को अपने हाथ से तोड़ा। श्रीकृष्ण ने फल के छह टुकड़े किए और अपनी आदत के मुताबिक पहला टुकड़ा सुदामा को दिया। सुदामा ने टुकड़ा खाया और बोला, 'बहुत स्वादिष्ट! ऐसा फल कभी नहीं खाया। एक टुकड़ा और दे दें। दूसरा टुकड़ा भी सुदामा को मिल गया। सुदामा ने एक टुकड़ा और श्रीकृष्ण से मांग लिया। इसी तरह सुदामा ने पांच टुकड़े मांग कर खा लिए। जब सुदामा ने आखिरी टुकड़ा मांगा, तो श्रीकृष्ण ने कहा, 'यह सीमा से बाहर है। आखिर मैं भी तो भूखा हूं। मेरा तुम पर प्रेम है, पर तुम मुझसे प्रेम नहीं करते।' और श्रीकृष्ण ने फल का टुकड़ा मुंह में रख लिया। मुंह में रखते ही श्रीकृष्ण ने उसे थूक दिया, क्योंकि वह कड़वा था। श्रीकृष्ण बोले, 'तुम पागल तो नहीं, इतना कड़वा फल कैसे खा गए?' उस सुदामा का उत्तर था, 'जिन हाथों से बहुत मीठे फल खाने को मिले, एक कड़वे फल की शिकायत कैसे करूं? सब टुकड़े इसलिए लेता गया ताकि आपको पता न चले। अत: जहां मित्रता हो वहा संदेह कैसे हो।

 प्रस्तुति : विकास दीप त्यागी

 संपादक: यूरेशिया न्यूज़