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कभी किसी को मुकम्मल जहां नहीं मिलता/ कहीं ज़मीं तो कहीं आसमां नहीं मिलता
November 29, 2019 • Vikas Deep Tyagi • राजनीतिक

शमीम  शर्मा

निदा फाज़ली की एक लोकप्रिय गज़ल का शे'र है—कभी किसी को मुकम्मल जहां नहीं मिलता/ कहीं ज़मीं तो कहीं आसमां नहीं मिलता।।
जिंदगी से जुड़ा यह शे'र अपनी बात ठीक अंदाज में कहता है और बात जंचती भी है। पर इलेक्शन हो जायें और फिर भी लोगों को महीने तक सीएम ना मिले तो इसे क्या कहेंगे। सरकार का गठन मुकम्मल होना तो दूर, प्रारम्भ होने में ही तीसियों दिन लग गये। अच्छा होता ईवीएम ही कुछ तिया-पांचा कर देती और एक पार्टी को बहुमत मिल जाता तो सरकार तो बन जाती। कुर्सी भी बेचारी अपने भाग्य को कोसती कि कोई बैठने वाला समय से नहीं मिला। यह सिंहासन की सरेआम बेइज्जती नहीं तो और क्या है। भानुमती अब कुनबा जोड़ने में सफल हुई। पता नहीं ईंट और रोड़े भी कौन-सी मिट्टी के बने हैं जो अब जाकर जुड़े।
वैसे राजनीति की समस्याओं का कोई साइज नहीं होता बल्कि वे तो हमारे हल करने की क्षमता के अनुसार छोटी-बड़ी होती रहती हैं। राजनीति की सबसे विशाल समस्या सिर्फ नम्बरों पर आधारित है। जादुई आंकड़ा छूने के लिये सारी नीति-रीति धरी रह जाती हैं। या तो मजबूर आदमी अपने थूके हुए को चाट सकता है और या राजनेता। गरीब बच्चों को चूसे हुए गन्नों के छिलकों को उठाकर चूसते हुए देखा है और यही काम आज राजनेता कर रहे हैं। जिन्हें गालियां दे-दे कोसा और गन्ने की तरह जिनका जूस निकालने के दावे किये, अब उन्हीं को गले लगा सिंहासन पर बैठने की तैयारी हो रही है।
कहावत है कि मुसीबतें व्यक्ति को विचित्र साथियों और हालातों से मिलवा देती हैं। पर कुछ नमूने तो ऐसे सोल्यूशन बताते हैं कि बन्दा अपनी समस्या ही भूल जाता है। राजनेताओं की आधी से ज्यादा समस्याएं सिर्फ भरोसे नामक तत्व की कमी के कारण पैदा होती हैं। विश्वास हो तो मिट्टी की गुल्लक में धातु के सिक्के भी सुरक्षित रहते हैं। और अनबन हो जाये तो आदमी अपनी सौ मन की तिजोरी को भी शक की निगाहों से देखता है। कई बार बुरा वक्त देखकर हम जिन्हें ठुकरा देते हैं, फिर वक्त लेकर उनसे मिलना पड़ता है। तब पता चलता है कि कौन बिखर गया और कौन निखर गया।
वोटिंग के समय जनता को पाठ पढ़ाया जाता है कि समय पर मतदान अवश्य करें। काश कोई नेताओं को भी समझाये कि समय पर सरकार अवश्य बनायें।
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एक बर की बात है अक नत्थू फेल होग्या अर उसका बाब्बू मोहल्ले मैं लाड्डू बांटण लाग ग्या। पड़ोसी बोल्या-चौधरी साब! फेल होण के लाड्डू क्यूंकर। सुरजा बोल्या-क्लास मैं 60 टाबरां मैं तै 40 लुढ़केंगे तो बहुमत तो मेरे छोरे के साथ है।