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क्या है BCG? कोरोना वायरस के कारण इसलिए आया चर्चा में 
April 19, 2020 • Vikas Deep Tyagi • उत्तर प्रदेश
यूरेशिया संवाददाता
मेरठ।  अमेरिका के एक शोध में पता चला था कि जिन देशों में बीसीजी के टीके नहीं लगे हैं उन्हें कोरोना से ज्यादा खतरा है। बता दें कि नवजात शिशु को दिया जाने वाला बीसीजी का टीका कोरोना वायरस संक्रमण में सुरक्षा के तौर पर सामने आया है। शोध के नतीजे उन देशों के लिए सुखद हैं, जहां सालों से बीसीजी के टीके लगते आए हैं।।
  • क्या है बीसीजी?
बीसीजी यानी बैसिलस कैलमेट-गुएरिन। यह एक वैक्सीन है, जिसका उपयोग टीबी बीमारी को ठीक करने के लिए किया जाता है। टीबी यानी टय्बूरकुलोसिस या कोढ़ यानी लेपरोसी जैसी बीमारी जिन देशों में आम हैं उन देशों के लिए इसका इस्तेमाल किया जाता है। नवजात शिशु को यह टीका लगाया जाता है। भारत में इसका इस्तेमाल आम है।

टीबी के अलावा और कौन-सी बीमारियों में होता है इस्तेमाल-

  • बीसीजी टीबी के अलावा बुरुली अल्सर जैसे माइकोबैक्टीरिया संक्रमण के लिए प्रभावकारी है।
  • देखा गया है कि यह वैक्सीन ब्लैडर कैंसर के लिए उपयोगी है

इन देशों में कभी नहीं लगा टीका

अमेरिका, इटली, नीदरलैंड्स, बेल्जियम और लेबनान आदि देशों में यह टीका कभी नहीं लगाया गया। जिसके कारण वहां के लोग सबसे ज्यादा प्रभावित होंगे।
इन देशों में उन देशों की तुलना में चार गुना ज्यादा मामले सामने आएंगे जहां लंबे समय से यह टीका लगता आ रहा है।
उन देशों में भी ज्यादा मामले सामने आएंगे जहां टीके पहले लगते थे लेकिन बाद में बंद हो गए।
1921 से हो रहा है इस्तेमाल-
  • माना जाता है कि इसका पहली बार इस्तेमाल साल 1921 में मानवों पर किया गया था।
  • जबकि साल 1948 में बड़े स्तर पर इसका इस्तेमाल हुआ।
  • उस वक्त यह भी सुनिश्चित किया गया कि यह टीका बच्चों पर इस्तेमाल होगा।
एम्स के डॉक्टर ने क्या कहा?
 
कोरोना का असर कम होने का रिश्ता क्या सिर्फ बीसीजी के टीके से ही है? इस बारे में देश के सबसे बड़े अस्पताल एम्स के निदेशक डॉ रणदीप गुलेरिया ने बताया, ‘’ये कहा जा रहा है कि जिनको बीसीजी का इंजेक्शन लगा है, उससे कुछ हद तक वायरस के खिलाफ इम्युनिटी होती है. ये एक रिसर्च आई है. उसका रिजल्ट है. कॉज एंड इफेक्ट है या कैजुएल रिलेशन है. ये क्लियर नहीं है.’’
मैक्स अस्पताल के डायरेक्टर ने क्या कहा?
मैक्स अस्पताल के ग्रुप मेडिकल डायरेक्टर संदीप बुद्धिराजा ने इस बारे में बताया, ‘’यूके में बीसीजी टीका सिर्फ क्रिटिकल मरीजों को दिया जाता है, ये वो मरीज हैं जो टीबी के रिस्क पर हैं. हिंदुस्तान में ये टीका साल 1947 से सबको दिया जा रहा है. कई देशों में ये अलग-अलग समय पर शुरू हुआ. ईरान में 1984 में शुरू हुआ. जापान 1946 से और ब्राजील 1927 से इसे इस्तेमाल कर रहा था. ये देखा गया है कि जो देश इस टीके को जितने पुराने समय से इस्तेमाल कर रहे थे, उतना ही वहां कोरोना वायरस से मरने वालों की तादाद कम रही.’’
डॉ संदीप बुद्धिराजा ने  बताया कि रिसर्च में पता चला है कि-
ईरान में 1984 से बीसीजी का इस्तेमाल हो रहा था, वहां मृत्यु दर 19 फीसदी थी.
जापान में 1946 से बीसीजी का इस्तेमाल हो रहा था, वहां मृत्यु दर 0.5 फीसदी थी.
ब्राजील में 1927 से बीसीजी का इस्तेमाल हो रहा था, वहां मृत्यु दर .02 फीसदी थी.
बीसीजी इलाज नहीं, वो इम्युनिटी बढ़ा सकता है- डॉक्टर
 
डॉ संदीप बुद्धिराजा ने कहा, ‘’दो चीजें का बड़ा अच्छा ऑब्जर्वेशन था कि जिन-जिन देशों में बीसीजी इस्तेमाल हुआ, वहां कोरोना का असर कम हुआ है. और जितने सालों से इस्तेमाल हुआ है, उतनी मौतें कम हुई हैं. अब स्टडी हो रही है कि क्या हेल्थ केयर वर्कर को वैक्सीन दें तो क्या वो ग्रुप बच सकता था और दूसरा क्या जिनको मिल चुका है उनको बूस्टर दे दें. बीसीजी इलाज नहीं, वो इम्युनिटी बढ़ा सकता है.’’
साफ है कि बीसीजी का टीका कोरोना वायरस का इलाज नहीं है. कुछ रिसर्च में पता चला है कि जिन देशों में ये टीका लगता रहा है, वहां कोरोना वायरस का असर दूसरे देशों की तुलना में कम है. ये कोरोना के खिलाफ प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ा सकता है, लेकिन अभी इस पर भी रिसर्च चल रही है. इसलिए इस दावे पर अभी कुछ निश्चित तौर पर नहीं कहा जा सकता.