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लॉकडॉउन में मुजफ्फरनगर के दर्जन भर बंधुआ ईंट भट्टा मजदूर पंजाब से मुक्त कराए गए
June 27, 2020 • विकास दीप त्यागी
  • "मजदूरों ने कहा हमें मालिक और ठेकेदार द्वारा लगातार प्रताड़ित किया गया।"
यूरेशिया संवाददाता
मुजफ्फरनगर ! उत्तरप्रदेश के मुजफ्फरनगर जिले के करीब 13 बंधुआ मजदूरों समेत करीब 37 अन्य मजदूरों को पंजाब के कपूरथला और जालंधर जिलो के ईंट भट्ठे से मुक्त कराया गया है। बंधक बनाकर रखे गए सभी 37 मजदूर बिलासपुर छत्तीसगढ़ के रहने वाले है। जिन्हे एक्शन एड एसोसिएशन एवं "नेशनल कैम्पेन कमिटी फ़ॉर इरेडिकेशन ऑफ बोंडेड लेबर" (NCCEBL) के संयुक्त अभियान द्वारा छुड़ाया गया है। छुड़ाए गए बंधको में 13 मजदूर मुजफ्फरनगर के रहने वाले है।
 
इन बंधुआ मजदूरों ने एक्शन एड लखनऊ को अपनी आपबीती सुनाई, संस्था ने "नेशनल कैम्पेन कमिटी फ़ॉर इरेडिकेशन ऑफ बोंडेड लेबर" के साथ मिलकर मजदूरों को रेस्क्यू कराने की रणनीति बनाई। पत्र लिखने के बाद भी स्थानीय प्रशासन ने इन्हे मुक्त कराने में कोई रुचि नहीं दिखाई। एन.सीसी.इ.बी.एल ने माननीय उच्च न्यायालय पंजाब का दरवाजा खटखटाया और जिला प्रशासन को आदेश पारित कराया।
 
एन.सीसी.इ.बी.एल के संयोजक और मानवाधिकार कार्यकर्ता निर्मल गोराना ने बताया कि, हमारी टीम को एक बंधुआ मजदूर ने सूचना दी थी कि यहां बच्चो एवं महिलाओं को फरवरी 2020 से बिना किसी वेतन के बंधक बनाकर कार्य करने पर मजबूर किया जा रहा है। अब लॉकडाउन के चलते मजदूर कहीं आ जा भी नहीं सकते है। यहां  हमारा लगातार मानसिक और शारीरिक शोषण हो रहा है।
निर्मल गोराना ने बताया कि पंजाब के कपूरथला एवं जालंधर के गांवों में स्थित ईंट भट्टो पर 50 बंधुआ मजदूरों को छुड़ाने का निर्देश माननीय उच्च नयायालय ने जिला प्रशासन को दिया। तब जाकर मुजफ्फरनगर और बिलासपुर छत्तीसगढ़ के मजदूरों को मुक्त कराया जा सका।
शासन की तरफ से मुक्त हुए मजदूरों को तीन तीन लाख रुपए प्रति मजदूर, आवास एवं खेती के लिए भूमि आवंटन से लेकर मजदूरों के शिक्षा एवं स्वास्थ्य सुविधाएं तक "मजदूर पुनर्वास कानून" के तहत प्रदान की जाती है। ताकि पीड़ितो को समाज की मुख्यधारा से जोड़ा का सके। 
 
एक्शन एड लखनऊ से इमरान हुसैन ने बताया कि संस्था इससे पहले भी देश के विभिन्न राज्यो से  बंधुआ मजदूरों को मुक्त करा चुकी है। एक्शन एड और एनसीसीइबीएल इस केस में भी निरन्तर प्रयासरत थी। अभी सभी मजदूरों को शासन के सहयोग की आवश्यकता है। क्योंकि पूर्व में भी संगठनों के प्रयास से मुक्त हुए बंधुआ मज़दूरों को पुनर्वास न मिलने के कारण इन्हीं मजदूरों ने हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। कुछ मामले आज भी कोर्ट में विचाराधीन है। लेबर लॉ एक्ट 1976 के तहत उन पर  कार्यवाही भी हुई है।
 
एक्शन एड के जिला समन्वयक क़मर इंतेख़ाब ने कहा कि लॉकडॉउन में सभी मजदूर अपने घर पहुंचकर अत्यंत प्रसन्न है।हमने देखा है, सभी भट्टा मज़दूरों की हालत वर्तमान में बडी दयनीय है। अधिकतर मजदूर भूमिहीन एवं अत्यंत गरीब है जो आसानी से बँधुआ मजदूरी के जाल में फिर फंस सकते है। क्योंकि पश्चिमी उत्तर प्रदेश के दलित एवं मुस्लिम परिवार गरीबी के कारण अधिक शोषित है। उत्तर प्रदेश सरकार को तत्काल बंधुआ मज़दूरों की पुनर्वास योजना 2016 के तहत इन्हे पुनर्वासित करना चाहिए। पुनर्वास के अभाव में मजदूर फिर से प्रवास या पलायन को मजबूर हो सकते है।