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पायलट' के बहाने राजशाही में परिवर्तित होता देश का प्रजातंत्र!
July 15, 2020 • विकास दीप त्यागी • राजनीतिक
  • पायलट प्रकरण पर विद्रुप राजनीतिक व्यवस्थाओं पर समय का वज्रपात
  • भारत को खंड खंड करने वाली व्यवस्थाओं का कुटिल सच
  • एक ऐसी सोच जिसमें जनता और जनतंत्र दोनों को किया पंगु
  • वर्तमान व्यवस्था में जनप्रतिनिधियों की जवाबदेही जनता नहीं मठाधीश के प्रति तय      

विश्व बंधु शास्त्री

आज मीडिया में सचिन पायलट प्रकरण की गुंज है। सारे चैनलों में हर अपडेट दिखाई जा रही है, विशेष डिबेट चल रहीं हैं। तथाकथित विशेषज्ञों के इस मुद्दे पर अलग अलग विचार हैं जो पूरी तरह अपनी पार्टियों के नफा-नुकसान पर आधारित हैं। चैनल भी अपने लिए लाभ और हानि के गणित से प्रेरित होकर अपने ही लाभ का ध्यान रख खबरें और डिबेट चला रहे हैं। इसके उलट प्रिंट मीडिया लगभग तटस्थता अपनाये हुए तो है, खबर को प्रमुखता भी दे रहे हैं लेकिन बिन प्रयोजन के। प्रिंट मीडिया के पास अधिक उचित कारण हैं इसके बहाने भारतीय राजनीति के चरित्र का विश्लेषण करने के, लेकिन यहां ऐसा एक भी लेख अभी तक तो प्रकाशित नहीं हुआ। जो बीमारी की तह तक जाता प्रतीत होता हो। मीडिया के पास ऐसे मौके पहले भी आये हैं जब भारतीय राजनीति के चरित्र का सच्चा कच्चा चिट्ठा खोला जाना देश और समाज हित में था। लेकिन दुर्भाग्य से किसी भी मौके पर मीडिया खरी नहीं उतरी। आज भी जब राजस्थान में धन बल और बाहुबल का नंगा नाच नाचा जा रहा है तब भी मीडिया मर्म में न झांकने की अपनी पुरातन परंपरा ही निभाकर इतिश्री कर रही है। जो राष्ट्र और समाज के प्रति अनिच्छा में किया गया पाप ही कहा जा सकता है। ऐसा भी नहीं कि यह पाप अकेले मीडिया ही कर रहा हो, वरन ज्यूडिशियरी भी घटनाओं पर संज्ञान न लेकर उसी पाप में सनी हुई है, तो प्रशासन जो आकंठ दबाव और भ्रष्टाचार में डूबा है उससे तो उम्मीद भी नहीं की जा सकती, वहीं केंद्रीय सत्ता प्रतिष्ठान भी मूकदर्शक भूमिका में वही पाप करता प्रतीत हो रहा है। कहा जा सकता है कि हमाम में सब नंगे हैं लेकिन दिखाने का प्रयास दूसरों को है कि देखो फलां तो पापी है।
          " आंखों देखा भी कभी कभी सच नहीं होता" यह कहावत हम सभी ने सूनी है। लेकिन यह राजनीति और अपराध दोनों जगह पूरी तरह चरित्रार्थ होती है। यहां भी हो रही है, लेकिन इस शह और मात के खेल को देखने के लिये विशेष चश्मों की जरूरत है जो जनसामान्य के पास नहीं हैं। यदि होते तो यह नंगा जिसमें पीडक भी खुद को शहीद होना दर्शा रहा है तो पीड़ित भी शहादत का लबादा ओढने में कोर कसर छोड नहीं रहा। जबकि कडवा सच तो इतना है कि मां भारती के संसाधनों को कौन कितना दोहन कर सकता है और किस निर्लज्जता के साथ कर सकता है। सफाई इतनी कि मां भारती के सच्चे सपूत का तमगा भी मिले। लेकिन इन दोंनो ही पक्षों का मठाधीश कोई और ही है जो अपनी चारण पादुकाओं पर राज करना चाहता है। वह है कांग्रेस इंदिरा की अध्यक्ष सोनिया गांधी। जिसकी ममता अपने अयोग्य साबित हो चुके बेटे राहुल गांधी के सिर प्रधानमंत्री का ताज तो देखना चाहतीं ही हैं। यह भी सुनिश्चित करने में पूरी ऊर्जा खर्च कर रही हैं कि वह इस प्रा0 लि0 पार्टी के सदैव सर्वे सर्वा भी बने रहें, ताकि देश और उसके संसाधनों का दोहन परिवार हित में सुनिश्चित है सके। इस विचार को पोषण अशोक गहलोत अपने पिछले कार्यकाल में भी देते रहे। यही नहीं अपने पिछले कार्यकाल में अशोक गहलोत ने सोनिया गांधी के दामाद को लंगोटिया से अरब पति बनाने में कानूनों के दुरुपयोग से भी गुरेज नहीं किया। जिन पर अब जाकर जांच केंद्र की एजेंसियों द्वारा की जा रही है। अशोक गहलोत का मुख्यमंत्री रहना गांधी परिवार के पापों को जहां ढकने में कारगर है वहां चारण राज की इच्छित अभिलाषा के लिये वरदान सिद्ध हो भी रहा है और आगे भी उसके जारी रहने की कवायद में ही नंगा नाच भी। जिसका सबसे बड़ा सबूत चौरासी विधानसभा के विधायक का वीडियो सोशल साइट्स पर न सिर्फ वायरल हो रहा है जिसमें वे अपने अपहृत होने की बात कह रहे हैं। लेकिन वह भी पुलिस की गैरकानूनी हरकत द्वारा, जिसका संज्ञान न तो भारत की कोर्ट ले रहीं हैं न ही ही प्रशासन और इस सबके ऊपर केंद्रीय सत्ता प्रतिष्ठान भी मूक दर्शक बन अपना फायदा सुनिश्चित करने के लिए गिद्ध दृष्टि लगाये बैठा है।
          चौरासी के विधायक का वायरल वीडियो एक ओर से तुष्टि का भाव लाता है कि निर्णायक सत्ता का केंद्र अभी भी विभक्त जनता बनी हुई है। उसका कारण यह है कि राजनीतिक दलों ने भले ही फर्जी वोट बनवाने की कला सीख ली हो, जनता पर अन्नदाता होने का झूठा दंभ भी भले ही ये सीख गये हों, जनता को दरकिनार करना भी, लेकिन वोट की काट अभी राजनीतिक दलों द्वारा ढूंढ पाना या उस निष्कर्ष पर एकमत हो पाना ये अभी नहीं सीख पाये हैं। यही कुल मिलाकर 73 साल की आजादी में संतोषजनक है अन्यथा तो जनता जनार्दन नहीं रही वरन शोषित बना दी गई है।
        सचिन पायलट प्रकरण ने आने वाले समय में भारत की अखंडता और उसकी प्रजातांत्रिक प्रणाली को होने वाले खतरों के प्रति हमें (जनसामान्य) सोचने का दुर्लभ मौका दिया है, यह बिल्कुल अलग बात है कि हम इस पर गंभीर मंथन कर अपने दायित्वों का कितना निर्वहन कर अपनी व्यवस्था को अक्षुण रख भी पातें हैं या नहीं। यहां नहीं के व्यापक और खतरनाक प्रतिफलों से इंकार नहीं किया जा सकता।
        दुनिया में हम अपनी अखंडता, विविधता, और प्रजातांत्रिक प्रणाली की डींगें भले ही हांकते हों, लेकिन सच इसके बिल्कुल उलट है। जिस देश में जनता के चुने हुए सांसदों, विधायकों का अपहरण सामूहिक रुप से संभव हो अपने राजनैतिक फायदे के लिए, जबकि अपहरण कानूनी गंभीर अपराध की श्रेणी में आता है तो फिर छूट क्यों? अपहरण पर प्रशासनिक स्तर पर कार्यवाही क्यों नहीं? जिस देश में प्रजातंत्र का मूल उद्देश्य समानता हो, लेकिन वहीं पर असमानता को पोषण देने वाले कानून बना दिये गये हों, जिसे परखने की जरूरत न कोर्ट को है न जनता को और न ही विपक्ष को.... तो प्रजातंत्र ही कटघरे में आ खडा होता है। जिस देश में जनता के चुने हुए जनप्रतिनिधि जनता के प्रति उत्तरदायी न होकर अपने दल के अध्यक्ष के प्रति जवाबदेह हों, तो प्रजातांत्रिक प्रणाली ही खोट युक्त क्यों नहीं बनती? जहां व्यवस्था ही भ्रष्टाचार पर टिकी हो.... न्याय जहां दूर की कोडी बन गयी हो..... तो कहा जा सकता है कि प्रजातंत्र की अवधारणा सफल नहीं हो पा रही है। लेकिन इसके बाद भी जनता बेहतर कल की अपेक्षाओं का पिटारा ढो रही हो तो थोडी उम्मीद बंधती है।
       सचिन पायलट प्रकरण में खोट खुलकर सामने आये हैं तो विवेचना आवश्यक हो जाती है। अभिव्यक्ति की आजादी, सीधे सीधे मत को प्रभावित करती है लेकिन जब अभिव्यक्ति का अधिकार ही कानून बनाकर छीन लिया जाय तो कैसे स्पष्ट मत की कल्पना की जा सकती है? यही काम बडी चतुराई के साथ किया गया था, राजीव गांधी के प्रधानमंत्रित्व काल में दल बदल विरोधी कानून बनाकर। जिसने सत्ता के केंद्रीयकरण का मार्ग प्रशस्त कर दिया। दूसरे शब्दों में यह तानाशाही को बढ़ाने वाला कानून साबित हुआ। हैरत की बात यह है कि इस कानून का विरोध विपक्ष ने भी नहीं किया, क्योंकि यह उन्हें भी अपनी राजनैतिक सल्तनत कायम करने मे उतना ही सहायक था जितना सत्ता पक्ष को। किसी भी प्रजातंत्र के लिये इस स्थिति को खतरे की घंटी माना जा सकता है। इस कानून के प्रावधान सत्ता को व्यक्ति वाद की और ले जाने के लिए प्रयाप्त हैं। कल्पना कीजिये आने वाले समय में यह धारणा प्रबल हुई तो क्या आज का हमारा प्रजातंत्र कल राजशाही में परिवर्तित नहीं हो सकता? जवाब है अवश्य हो सकता है। तब की केंद्रीय सत्ता पर  काबिज पार्टी के मुखिया को सिर्फ आज के प्रदेशों में मजबूत प्रतिद्वंद्वियों को पुरातन काल की सूबेदारी का लोभ देना प्रयाप्त होगा। इसी तरह प्रजातंत्र कब राजशाही में तब्दील हो गया जनता को पता भी जब चले तो देर हो चुकी होगी। आसान शब्दों में कहें तो तब  जनता का इकलौता अधिकार जो आज तो है वोट का, इसकी भी जरुरत नहीं रहने वाली है। साथ ही यह भी नहीं भूलना चाहिए कि तब की व्यवस्था के सूबेदार अपने प्रदेश को लेकर कब भारत से अलग हो जायेंगे ठीक से नहीं कहा जा सकता। वही स्थिति भारत गणराज्य को विखंडित कर देगी।
     सचिन पायलट प्रकरण हमें आगामी खतरे पर संज्ञान लेने को प्रेरित करता है। अब देखिये एक प्रदेश के उपमुख्यमंत्री के खिलाफ सत्ता का दुरुपयोग कैसे किया जाता है और वह भी खुद के मुख्यमंत्री द्वारा.... मुख्यमंत्री के निर्देश पर प्रशासन अपने ही उपमुख्यमंत्री के खिलाफ बिन मतलब की रिपोर्ट दर्ज कर यह साबित कर देता है कि प्रशासन सिर्फ मुख्यमंत्री के हाथ का खिलौना है अन्य कई कोई हैसियत नहीं। यानि सरकारी मशीनरी भी दुराचारी साबित होती है मुख्यमंत्री भी। कानून के दुरुपयोग की कल्पना की जा सकती है जबकि प्रजातंत्र में इसकी गुंजाइश नहीं। लेकिन कुछ कानून ऐसे बना दिये गये हैं जिनके आगे जनता और जनतंत्र दोनों पंगु बनकर रह गये हैं। यही वह सोच है जो भारत गणराज्य को खंडित भी कर सकती है और वर्तमान व्यवस्था को बदलने की सामर्थ्य भी देर सवेर जुटा ही लेगी। आज की तटस्थता कल के विनाश को मौन आमंत्रण दे उससे पहले ही जनता को फिर आगे आना ही होगा, अपने देश और आगामी पीढियों के बेहतर भविष्य को सुनिश्चित करने के लिये। तथास्तु......
                लेखक स्तम्भकार व वरिष्ठ पत्रकार है।