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श्रीलंका राष्ट्रपति चुनाव: नये नेतृत्व से बेहतर संबंधों की आस
November 30, 2019 • Vikas Deep Tyagi • राजनीतिक

17 नवम्बर को जैसे ही श्रीलंका के राष्ट्रपति चुनाव में गोटाभाया राजपक्षे को स्पष्ट बहुमत मिलने का ऐलान हुआ, प्रधानमंत्री मोदी ने तुरंत उन्हें अपना बधाई संदेश दिया। इस रण में राजपक्षे ने अपने मुख्य प्रतिद्वंद्वी सजिथ प्रेमादासा को 13 लाख 60 हजार के विशाल मत-अंतर से हराया। भारत की तरह श्रीलंका की राजनीति में भी प्रभावशाली परिवार लगातार अपना दबदबा बनाए हुए हैं। वामपंथ की ओर झुकाव रखने वाली 'श्रीलंका फ्रीडम पार्टी' (एसएलएफपी) की कभी जीवनपर्यंत सदस्यता रखने वाले राजपक्षे परिवार ने कुछ वर्ष पहले इससे जुदा होकर 'श्रीलंका पोडुजना पेरुमना' नामक पार्टी बनाई है। यह काम वर्ष 2015 में हुए चुनाव में राजपक्षे परिवार को मिली हार के बाद किया गया था। पराजय के पीछे विपक्ष का वह अभूतपूर्व गठबंधन था, जिसमें वामपंथी एसएलएफपी और एकदम विपरीत ध्रुवीय विचारधारा वाली दक्षिणपंथी 'यूनाइटेड नेशनल पार्टी' ने मैत्रीपाला सिरीसेना को संयुक्त रूप से खड़ा किया था, जिन्होंने राजपक्षे पर अप्रत्याशित जीत प्राप्त की थी।

तब राजपक्षे ने अपनी इस हार के लिए भारत पर दोषारोपण किया था। यह सब उस वक्त हो गुजरा था, जब उनकी छवि दुर्दांत लड़ाई के बाद एलटीटीई को खत्म करने वाले हीरो की थी। लेकिन इस युद्ध में मानवाधिकार हनन और निर्दोष लोगों के नरसंहार की वजह से अतंरराष्ट्रीय स्तर पर राजपक्षे बंधुओं को दोषी ठहराया गया था, अनुमान है कि लगभग 70000 तमिल सिविलियन मारे गए थे। हालांकि हकीकत यह भी है कि दोनों ही पक्षों ने मानवाधिकारों का जमकर हनन किया था। एलटीटीई के सर्वेसर्वा वेलुपिल्लई प्रभाकरण के लिए मानव की जिंदगी की प्रति जरा भी इज्जत नहीं थी, चाहे वह विरोधी सिंहाला प्रजाति का हो या फिर अपना ही तमिल बंधु-बांधव क्यों न हो।
राष्ट्रपति पद पर राजपक्षे परिवार के सदस्य गोटाभाया के चुने जाने के बाद कयास यह भी हैं कि इस मुल्क की तमिल और मुस्लिम अल्पसंख्यकों के मन में संशय पैदा हो जाएगा। राजपक्षे बंधुओं ने पिछले सिरीसेना प्रशासन की उस कोताही का जमकर दोहन किया है, जिसमें भारत की खुफिया एजेंसियों ने समय रहते आगाह किया था कि देश में आईएसआईएस से प्रभावित होकर श्रीलंकाई मुस्लिम चरमपंथी आतंकी हमले की तैयारी कर रहे हैं। परंतु सिरीसेना सरकार चुनावी प्रचार में इस कदर मस्त रही कि इस चेतावनी को गंभीरता से नहीं लिया और इसी साल एक रविवार को ईस्टर वाले दिन इस्लामिक आतंकियों ने अपने खूनी खेल को अंजाम दिया, जिसमें 170 श्रीलंकाई नागिरकों की जान गई थी।
मुख्यतः राजपक्षे परिवार को चीन-हितैषी की तरह लिया जाता है। पिछली राजपक्षे सरकार ने कोलंबो बंदरगाह पर चीनी पनडुब्बियों को अपना अड्डा बनाने की इजाजत दी थी। कोलंबो की यात्रा पर आया कोई भी यह भांप सकता है कि किस कदर चीनी कंपनियां वहां चल रही भवन निर्माण परियोजनाओं में हावी हैं। हालांकि श्रीलंका पहले ही चीन की 'कर्ज-कूटनीति' (उधार दो-गुलाम बनाओ) का शिकार बन चुका है। कर्ज चुकता न कर पाने की एवज में उसे अपने सामरिक रूप से महत्वपूर्ण दक्षिण-पश्चिमी बंदरगाह हम्बनटोटा का प्रबंधन चीन को मजबूरन सौंपना पड़ा था। एशिया और अफ्रीका के दीगर देशों में यह अब आम देखने को मिल रहा है कि किस तरह चीन पहले वहां सड़क, पुल, बंदरगाह, खनन, बांध और अन्य परियोजनाओं को बनाने के लिए कर्ज देता है, फिर इसकी मकड़जाल वाली शर्तों के चलते जब वे मुल्क उधार चुकता करने में असमर्थ हो जाते हैं, तब वह इनका प्रबंधन अपने हाथों में ले लेता है।
वर्ष 2014 के पिछले राष्ट्रपति चुनाव के समय भारत ने संयुक्त प्रत्याशी द्वारा राष्ट्रपति राजपक्षे को हराने वाले घटनाक्रम पर अपनी प्रतिक्रिया बहुत सावधानीपूर्वक दी थी। यह स्पष्ट था कि दशकों तक एक-दूसरे के धुर विरोधी रहे और विपरीत विचारधारा वाले दो दल यानी यूएनपी और एसएलएफपी ज्यादा समय तक एक नाव में सवार नहीं हो सकते। इसके मद्देनजर भारत ने राजपक्षे परिवार और उसके मुख्य समर्थकों के साथ अपने संपर्क गुपचुप रूप से सुदृढ़ करने शुरू कर दिए थे। अधिकांश श्रीलंकाई लोगों की नजरों में राजपक्षे परिवार आज भी उस नायक की तरह है, जिसके नेतृत्व में तीन दशकों तक चले लंबे खूनी जातीय संघर्ष में अंततः 2010 में राष्ट्रीय सेना को विजय मिली थी। इधर भारत ने श्रीलंका के उत्तर-पूर्वी प्रातों में बसी बड़ी तमिल आबादी और वेलुपिल्लई प्रभाकरण के नेतृत्व वाली एलटीटीई के बीच के अंतर को एकदम स्पष्ट कर रखा था, लिहाजा भारत ने जाफना में तमिलों के पुनर्वास और भलाई कार्यों हेतु काफी निवेश किया था।
21 अप्रैल 2019, ईस्टर के मौके पर समूचे श्रीलंका में जगह-जगह चर्चों और ईसाई लोगों पर किए गए आतंकी हमलों ने सत्ता में राजपक्षे परिवार की वापसी की इबारत तय कर दी थी। इन हमलों में 45 विदेशी पर्यटकों समेत कुल 259 लोग मारे गए थे। ये सभी आतंकी आईएसआईएस से जुड़े थे। भारत ने श्रीलंका को पहले ही आगाह कर दिया था और जरूरी खुफिया जानकारी भी उपलब्ध करवा दी थी। खतरे के अंदेशे को हल्के में लेने की इस भारी चूक ने सिरीसेना सरकार का भाग्य तय कर दिया था और नाराज हुए मतदाताओं ने उसे उखाड़ फेंका।
श्रीलंका के ताजा घटनाक्रम पर भारत ने जिस तरह समझदारीपूर्ण प्रतिक्रिया दी है, वह राजपक्षे परिवार की जीत के तुरंत बाद विदेश मंत्री एस. जयशंकर को कोलंबो यात्रा पर भेजने से झलकता है। जयशंकर श्रीलंका को बखूबी समझते हैं क्योंकि जातीय संघर्ष के चरमोत्कर्ष वाले दिनों में वे वहां भारत के राजदूत थे। उन्होंने नवनिर्वाचित राष्ट्रपति गोटाभाया को भारत यात्रा का औपचारिक निमंत्रण दिया है, जिसे स्वीकार करते हुए वे 29 नवम्बर को यहां आ रहे हैं। इससे पहले पूर्व राष्ट्रपति महेन्दा राजपक्षे, जो अब देश के प्रधानमंत्री हैं, की मुलाकात पिछले साल प्रधानमंत्री मोदी से नई दिल्ली में हुई थी। इस साल फरवरी माह में महेन्दा राजपक्षे बेंगलुरु में हुए एक मीडिया सम्मेलन में बतौर मुख्य वक्ता शामिल हुए थे। इसी साल भारत के आम चुनाव के बाद दुबारा प्रधानमंत्री बनने के बाद मोदी जून माह में श्रीलंका की यात्रा पर गए थे जहां उनकी मुलाकात महेन्दा राजपक्षे से फिर हुई थी।
चूंकि श्रीलंका की आर्थिकी काफी डांवांडोल है, इसलिए भारत के लिए जरूरी है कि वह वहां उलीकी गई अनेक महत्वपूर्ण परियोजानओं को सिरे चढ़ाने की दिशा में गंभीरता से आगे बढ़े। इनमें भी सबसे ज्यादा ध्यान उस समझौते पर देना होगा, जिसके तहत कोलंबो में जापान और भारत को मिलकर कंटेनर टर्मिनल बनाना है। भारत को खुद को लेकर बनी वह छवि मिटाने की जरूरत है, जिसमें कहा जाता है कि वह वादे तो बहुत बड़े-बड़े करता है, लेकिन पूर्ण करने में फिसड्डी है। अतएव आपसी सहमति से उलीकी गई परियोजनाएं जैसे कि चीन के नियंत्रण वाले हम्बनटोटा बंदरगाह के पास मताला हवाई अड्डा बनाने और पूर्वी तट पर स्थित त्रिंकोमाली का बंदरगाह विकसित करने को मूर्त रूप देने के लिए शीघ्रतम कदम उठाने पड़ेंगे। उम्मीद करते हैं कि हमें फिर से वैसा मंजर नहीं देखने को मिलेगा जब चीन की पनडुब्बियां हमारे ऐन पास वाले श्रीलंकाई बंदरगाहों पर आकर बेरोकटोक रुका करती थीं। इस बात को ध्यान में रखना होगा कि हिंद महासागर में समुद्री मार्गों की सुरक्षा सुनिश्चित करने में श्रीलंका की भूमिका हमारे लिए काफी अहम है।

लेखक पूर्व राजनयिक हैं।


 
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